इंसान खुद ही अपना विकास रोक देता है

इंसान को चेतना मिली है,पर उसने उसे बाहर खोजने की आदत बना ली।वह बदलना चाहता है दुनिया को,पर खुद को देखने से डरता है।यही डरउसके विकास की पहली दीवार है।तकनीक बढ़ी,पर समझ नहीं।बुद्धि तेज़ हुई,पर विवेक सो गया।इंसान जानता है क्या गलत है,फिर भी वही करता है—क्योंकि सुविधा सच्चाई से आसान लगती है।अहंकार कहता है […]

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सुख-दुःख से परे — साक्षी का मार्ग

जब जीवन में सुख आता है,तो वह अपने साथदुःख की संभावना भी लाता है। लेकिन मनुष्यसुख को स्थायी मान लेता है,और यहीं सेउसका भ्रम आरंभ होता है। अद्वैत कहता है—सुख और दुःखदोनों ही मन के भाव हैं,स्वरूप नहीं। जो आता है,वह जाता है।जो बदलता है,वह तुम नहीं हो। मनुष्य तब दुखी होता है,जब वह सुख

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alone but calm

आत्मविचार: खुद से मिलने की शुरुआत

हम पूरी ज़िंदगी बाहर जवाब खोजते रहते हैं —लोगों में, किताबों में, हालातों में। लेकिन सबसे ज़रूरी सवालहम खुद से कभी नहीं पूछते। मैं कौन हूँ?मैं जो सोच रहा हूँ, क्या वो सच में मेरा है?या बस सीखी हुई धारणाएँ हैं? आत्मविचार कोई किताब नहीं,कोई प्रवचन नहीं,बल्कि खुद के साथ ईमानदार होने की कला है।

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आत्मविचार क्या है? जीवन में आत्मचिंतन का महत्व

आत्मविचार का अर्थ है अपने विचारों, कर्मों और भावनाओं पर गहराई से चिंतन करना।यह व्यक्ति को स्वयं को समझने और अपने जीवन को सही दिशा देने में सहायता करता है। भारतीय दर्शन में आत्मविचार को आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी माना गया है।उपनिषदों और गीता में बताया गया है कि जब व्यक्ति स्वयं को जान लेता

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